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जंगे यमामा में जब हाफ़िजों की एक बड़ी संख्या शहीद हो गई तो सबसे पहले हज़रत उमर फ़ारूक़…

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सिद्दीक़ी दैर में यह नुस्ख़ा हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 के पास महफ़ूज़ रहा|हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि0 की वफ़ात के बाद फ़ारूक़ी दौर में यह नुस्ख़ा हज़रत उमर रज़ि0 के पास रहा और हज़रत उमर रज़ि0 की शहादत के बाद यह नुस्ख़ा उम्मुल मोमिनीन हज़रत हफ्सा रज़ि0 बिन्ते हज़रत उमर रज़ि0 के पास महफ़ूज़ कर दिया गया|
Battle of Yamama

Battle of Yamama

2•हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि0 भी हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि0 के साथ क़ुरान मजीद जमा करने की ख़िदमत में शरीक थे और हाफ़िज़े क़ुरान भी थे, अतः वे भी आयत की तस्दीक़ करते | 3•हज़रत ज़ैद रज़ि0 उस वक़्त तक कोई आयत क़ुबूल न करते जब तक भरोसेमन्द गवाह इस बात की गवाही न देते कि हां हक़ीक़त में यह आयत रसूल सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम के सामने ऐसे ही तहरीर की गई थी|
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4•आख़री में प्रस्तुत आयत का मुक़ाबला दूसरे सहाबा किराम रज़ि0 की लिखी हुई आयतों से किया जाता| जो आयत इन चार शर्तों पर पूरी उतरती, उसे क़ुबूल कर लिया जाता| इस जमा शुदा नुस्ख़े को “उम्म” कहा जाता है| इस “उम्म” में तीन स्पष्ट गुण ये थे:
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1• तमाम सूरतों की आयत की तर्तीब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहिस्सलाम की बतलाई हुई तर्तीब के मुताबिक़ तै कर दी गई| 2•इस नुस्ख़े में क़िरअत के साथ अक्षर या स्वर मौजूद थे ताकि जो इंसान जिस अक्षर या स्वर में आसानी से क़ुरान पढ़ सके, पढ़ ले |

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