सुबह जगा तो देखा मेरी पत्‍नी चौकीदार बन गई हैं- सुषमा स्‍वराज के पति ने किया ट्वीट…

हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के जरिए ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान की शुरुआत कर चुनावी बिगुल बजा दिया। इसके एक दिन बाद भारत में सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले पीएम मोदी ने इस अभियान को बढ़ावा देते हुए ट्विटर अकाउंट पर अपना नाम भी बदल लिया। उन्होंने अपने नाम के पहले चौकीदार शब्द जोड़ लिया।इस बदलाव के बाद ट्विटर पर जहां पहले उनका नाम ‘नरेंद्र मोदी’ था वो बदल कर ‘चौकीदार नरेंद्र मोदी’ हो गया। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ट्विटर पर अपने नाम के पहले चौकीदार जोड़ दिया। अब भाजपा के दो कद्दावर नेताओं द्वारा ट्विटर पर अपने नाम से पहले चौकीदार लगाने के बाद, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने ट्विटर पर खुद के नाम से पहले चौकीदार जोड़ दिया।

रेल मंत्री पीयूष गोयल, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्ष वर्धन और पेट्रोलियम मंत्री धर्मंद्र प्रधान, केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सहित तमाम नेताओं ने कुछ ही घंटे में अपने नाम के पहले चौकीदार जोड़ दिया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल ने खुद ट्वीट कर मजाकिया लहजे में कहा कि वो सुबह उठे तो उनकी पत्नी चौकीदार बन गईं।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल ने सोमवार (18 मार्च, 2019) को ट्वीट कर लिखा, ‘मैं आज सुबह जगा तो मेरी पत्नी चौकीदार बन गईं।’ स्वराज कौशल के इस ट्वीट पर सोशल मीडिया यूजर्स भी मजेदार कमेंट कर रहे हैं। गौरतलब है कि स्वराज कौशल मिजोरम के गवर्नर भी रह चुके हैं। आपातकाल के दिनों में उन्होंने मशहूर बड़ौदा डायनामाइट मामले में समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस का बचाव किया। दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल में इसी साल जनवरी में जॉर्ज फर्नांडीस की मौत हो गई थी।

मंत्रालय से जहाज की फाइल चोरी करने वाला चौकीदार को सजा मिली क्या-अखिलेश यादव

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए ट्विटर पर लिखा है कि ” ‘विकास’ पूछ रहा है… मंत्रालय से जहाज़ की फ़ाइल चोरी होने के लिए ज़िम्मेदार लापरवाह चौकीदार को सज़ा मिली क्या?”

उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए लिखा कि यह लापरवाह चौकीदार हैं। दरअसल सपा बसपा रैली गठबंधन एक महा परिवर्तन को लेकर कमर कस चुकी है। सत्ता में बदलाव की मांग हर तरफ उठाई जा रही है

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह भी लिखा है कि ” ‘विकास’ पूछ रहा है… जनता के बैंक खाते से चोरी-छिपे जो पैसे काटे जा रहे हैं, उससे बचाने के लिए कोई चौकीदार है क्या?” दरअसल अखिलेश यादव ने यह सवाल इसलिए उठाया क्यों के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने 1772 करोड़ रुपये मिनिमम बैलेंस पेनल्टी के तौर पर अप्रैल से नवंबर के बीच में लगाया गया।

sbi minimum balance Scam
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उन्होंने नरेंद्र मोदी के विकास पर हमला बोलते हुए लिखा कि ” ‘विकास’ पूछ रहा है…खाद की बोरी से चोरी रोकने के लिए भी कोई चौकीदार है क्या?”पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों के दिन-ब-दिन आत्महत्या के लिए मजबूर होने पर केंद्र की सरकार पर हमला बोलते हुए लिखा कि “एक तरफ़ ढाई लोग और उनके मंत्री नाम बदलने में व्यस्त थे तो दूसरी तरफ़ एक किसान सरकार से आत्महत्या करने की आज्ञा लेने पर मजबूर हो गया।दिन भर खेतों में मेहनत और चौकीदारी करके किसान अन्नदाता पेट नहीं भर पा रहा है।”

PM Scheme Yogi UP Scam
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अखिलेश यादव आगे लिखते हैं कि “कितनी शर्म की बात है कि किसान देश का पेट भरे और ख़ुद भूखा मरे!”  लोकसभा चुनाव की नजदीकियां  बढ़ते ही राज नेताओं की बयानबाजी  अपने चरम पर है । गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव सात चरणों में होंगे। पहला चरण 11 अप्रैल, दूसरा 18 अप्रैल, तीसरा 23 अप्रैल, चौथा 29 अप्रैल, पांचवा 6 मई, छठा 12 मई और सातवां 19 मई को होगा। 23 मई को मतगणना होगी। 23 मई को ही पता चलेगा कि लोगों ने अगले पांच सालों के लिए सत्ता की चाबी किस पार्टी को सौपेंगी और किस दल की तरफ लोगों का भरोसा भविष्य में रहेगा।

एनसीपी नेता ने मनोहर पर्रिकर को लेकर दिया विवादित बयान,कहा राफेल डील के पहले शिकार हुए पर्रिकर

मुम्बई: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र अव्हाड मीडिया से बातचीत के दौरान मुंबई में गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोहर पारिकर के ऊपर विवादित बयान दिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र अव्हाड का कहना है कि “राफेल डील के सबसे पहले शिकार बने मनोहर पारिकर’।

विधायक जितेंद्र अवहद ने कहा है कि पर्रिकर राफेल डील के पहले शिकार हैं। अवहद ने कहा कि वह राफेल डील से दुखी थे। आपको बताते चलें कि पर्रिकर का रविवार को निधन हो गया था। इससे पहले भी कई विपक्षी पार्टियों ने राफेल डील को लेकर पर्रिकर पर निशाना साधा था।

जितेंद्र अवहद ने कहा कि “मनोहर पर्रिकर काफी अक्लमंद और पढ़े-लिखे इंसान थे। वह दुखी थे। मुझे यह नहीं कहना चाहिए क्योंकि वह आज यहां हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वह राफेल डील का पहला शिकार हैं।मुझे लगता है कि राफेल सौदे के बाद उन्हें ठीक नहीं लगा, इसलिए उन्होंने वापस गोवा जाने का फैसला किया। ”

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टी के राजनेता बेतुका बयान बाजी करने से चूक नहीं रहे हैं। आपको बताते चलें कि लोकसभा चुनाव की तैयारियां पूरी कर ली गई है।गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव सात चरणों में होंगे। पहला चरण 11 अप्रैल, दूसरा 18 अप्रैल, तीसरा 23 अप्रैल, चौथा 29 अप्रैल, पांचवा 6 मई, छठा 12 मई और सातवां 19 मई को होगा। 23 मई को मतगणना होगी। 23 मई को ही पता चलेगा कि लोगों ने अगले पांच सालों के लिए सत्ता की चाबी किस पार्टी को सौपेंगी और किस दल की तरफ लोगों का भरोसा भविष्य में रहेगा।

हर राजनीतिक दल की तरफ से लोकसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियो को उतारा जा चुका है और हर प्रत्याशी जनता के बीच में जाकर मेहनत कर कर रहे हैं ताकि जनता उसे वोट दें और उसे विजय बनाए। हर राजनेता अपने एजेंडा को लेकर जनता के बीच रखता है और फिर 23 मई को ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जनता ने किस दल पर ज्यादा भरोसा किया और किसे 5 साल के सत्ता की चाबी सौंपेगी।

सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आरोप में फंसे स्मृति ईरानी के पति…?

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी के पति जुबिन फरदून ईरानी पर कथित तौर पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा है.केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी के पति जुबिन फरदून ईरानी और उनके सहयोगी पुष्पेंद्र सिंह पर मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के पास कथित तौर पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा है.ये आरोप एक स्कूल के प्रधान अध्यापक ने लगाया है. मंत्री स्मृति ईरानी ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर मामले की जानकारी मांगी है.
दरअसल मानपुर तहसील के कुचवाही गांव में मार्केज हॉस्पिटैलिटी हेरिटेज नामक कंपनी ने पांच एकड़ जमीन खरीदी है. इस कंपनी के निदेशक केंद्रीय मंत्रीस्मृति ईरानी के पति जुबिन हैं.

खबरों के मुताबिक 1956 से खसरा नंबर 75 की ढाई एकड़ जमीन स्कूल के नाम दर्ज है. वहीं स्कूल से लगी पांच एकड़ जमीन किसी हजारी बानी के नाम दर्ज है जो कई वर्षों से लापता है और उसका कोई वारिस नहीं है. ये जमीन स्कूल को आवंटित किए जाने की मांग 1998 से ही चल रही है. मामला फाइलों में दबा है.प्रधान अध्यापक का आरोप है कि एक व्यक्ति हजारी बानी का फर्जी वारिस बनकर सामने आया और कंपनी से जमीन का सौदा कर लिया. उधर कंपनी ने फेंसिंग करके स्कूल की जमीन पर भी कब्जा कर लिया है.

वहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने आज इस संबंध में कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है और मध्य प्रदेश सरकार को इसकी फौरन जांच कर तह तक जाना चाहिए.

मुसलमानों के सियासी वजूद कुचलने पर क्यों आमादा है कन्हैया कुमार?

मौसम के रूख के साथ राजनीति का रूख भी बदलना शुरू हुआ है. जैसे-जैसे सर्दी से बसंत की तरफ़ बढ़ रहे हैं, तापमान भी बढ़ता जा रहा है. मौसम के साथ-साथ चुनाव की तारीख़ों की घोषणा के बाद राजनीति का तापमान भी बढ़ना शुरू हुआ है. टिकट एवं सीट बंटवारे को लेकर बैठक पर बैठक हो रहे हैं. गठबंधन को लेकर भी उधेड़-बुन शुरू है. सभी जाति-विशेष के नेता एवं मतदाता अपनी प्रतिनिधित्व को लेकर बेचैन हैं. छोटी-छोटी पार्टियां दांवा ठोककर मज़बूती के साथ अपना प्रतिनिधित्व मांग रही हैं. लेकिन बिहार में लगभग 20 प्रतिशत की आबादी वाले मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की लगातार कोशिश हो रही है.

सबसे मज़ेदार बात बेगूसराय लोकसभा सीट को लेकर है. बेगूसराय लेनिनग्राद के नाम से मशहूर है. बेगूसराय क्षेत्र कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ समझा जाता है. लेकिन यह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है. अभी भी उसी भ्रम को आधार मानकर कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय पर अपनी दावेदारी पेश करती है. आज भी महागठबंधन में कम्यूनिस्ट पार्टी हिस्सेदार बनना चाहती है और बेगूसराय की सीट पर दावा ठोक रही है. जबकि बेगूसराय सीट मुसलमान समुदाय के हिस्से की सीट समझी जाती रही है.

पूर्व में जदयू से डॉ. मोनाज़िर हसन सांसद निर्वाचित हुए हैं. जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में राजद की टिकट पर पूर्व विधान परिषद डॉ. तनवीर हसन मोदी लहर में भी मज़बूत लड़ाई लड़े थे. अभी महागठबंधन होने की स्थिति में कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट पर जेएनयू के पूर्व छात्रनेता कन्हैया कुमार की नज़र बेगुसराय सीट पर है.

अभी तक यह भ्रम फैलाया जाता रहा है कि बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ रहा है और इसलिए ही बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जानते है. मैं जब कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूं तब सामूहिक रूप से सभी कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूं. लेकिन स्वतन्त्रता से लेकर आज तक केवल 1967 के लोकसभा चुनाव में ही बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के योगेन्द्र शर्मा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे. जबकि 1962 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय से आने वाले अख़्तर हाशमी, 1971 के लोकसभा चुनाव मे योगेन्द्र शर्मा और 2009 के लोकसभा चुनाव मे शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट से दूसरे स्थान पर रहे थे.

1977 के चुनाव में कम्यूनिस्ट पार्टी के इन्द्रदीप सिंह 72096 मत, 1998 में रमेन्द्र कुमार 144540, 1999 के चुनाव में सीपीआई (एमएएल) के शिवसागर सिंह 9317 और 2014 के लोकसभा चुनाव में कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र प्रसाद सिंह जदयु गठबंधन से 192639 मत प्राप्त करके तीसरे स्थान पर रहे थे. जबकि 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 2004 के लोकसभा चुनावों में कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय से अपना उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी थी. फिर सवाल है कि बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?

बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत चेरिया बरियारपुर, साहिबपुर कमाल, बेगूसराय, मठियानी, तेघरा, बखरी और बछवाड़ा विधानसभा का क्षेत्र आता है. चेरिया बरियारपुर से केवल एक बार 1980 के विधानसभा चुनाव में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के सुखदेव महतो विधायक चुने गए थे. साहिबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र से अभी तक एक बार भी कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने में सफल नहीं रही है. बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से आज़ादी के बाद से अब तक केवल तीन बार ही कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने में सफल रही है और आख़िरी बार कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र सिंह 1995 का विधानसभा चुनाव जीते थे.

मठियानी विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी तीन बार चुनाव जीतने में सफल रही है लेकिन सन 2000 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद आज तक कम्यूनिस्ट पार्टी यहां से चुनाव नहीं जीत सकी है. तेघरा विधानसभा क्षेत्र में कम्यूनिस्ट पार्टी लगातार 2010 से ही विधानसभा का चुनाव हार रही है. कम्यूनिस्ट पार्टी का पूर्ण रूप से दबदबा केवल दो विधानसभा क्षेत्रों क्रमशः बखरी और बछवाड़ा पर रहा है. लेकिन बखरी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी आख़िरी बार 2005 मे चुनाव जीतने में सफल रही थी. जबकि बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चार बार विधायक चुने गए हैं और आख़िरी बार 2010 का विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रहे थे.

सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि वर्तमान विधानसभा में बिहार में कम्यूनिस्ट पार्टी के मात्र तीन विधायक हैं और तीनों में से एक भी बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से जीतकर नहीं आते हैं. यानी 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक भी क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं रहे थे. प्रश्न फिर वही है कि जिस लोकसभा क्षेत्र में एक भी विधायक नहीं है वह कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?

2014 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन को कुल 369892 मत प्राप्त हुए थे. जबकि जदयु समर्थित कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजेन्द्र प्रसाद सिंह को 192639 मत प्राप्त हुआ था. वही 2009 के लोकसभा चुनाव में कम्यूनिस्ट पार्टी के शत्रुघ्न प्रसाद सिंह को 164843 मत प्राप्त हुआ था. यदि कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा 2009 और 2014 में प्राप्त किए गए कुल मतों को एक साथ जोड़ भी देते है फिर भी डॉ. तनवीर हसन साहब द्वारा 2014 के मोदी लहर मे प्राप्त किए गए मतों से भी कम है.

उपरोक्त आंकड़ें यह बताने के लिए काफ़ी है कि बेगूसराय कभी भी कम्यूनिस्ट पार्टी का मज़बूत क़िला नहीं रहा है. बल्कि पूर्वी चम्पारण (मोतीहारी), नालंदा, नवादा, मधुबनी, जहानाबाद इत्यादि ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां से दो या दो बार से अधिक कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद निर्वाचित हुए हैं. जबकि बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से मात्र एक बार ही कम्यूनिस्ट पार्टी को सफलता प्राप्त हो सकी है.

लेकिन प्रश्न यह है कि आख़िर कम्यूनिस्ट पार्टी क्यों बेगूसराय की सीट ही लेना चाहती है? जब कम्यूनिस्ट पार्टी सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर इतना चिंतित रहती है तब फिर क्यों बेगूसराय में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है?

एक तर्क है कि कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, इसलिए बेगूसराय की सीट कम्यूनिस्ट के खाते से कन्हैया को मिलनी चाहिए. यह बात सही है कि कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं और कम्यूनिस्ट विचारधारा के ऊर्जावान पथिक है. वह जब राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं तब भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते थे. मोतिहारी, नवादा, नालंदा, मधुबनी, जहानाबाद तो कम्यूनिस्ट का गढ़ रहा है और पहले से भी पार्टी के सांसद निर्वाचित होते रहे हैं फिर बेगूसराय पर ही नज़र क्यों है?

अरविंद केजरीवाल दिल्ली से चलकर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध बनारस चुनाव लड़ने आए थे. दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश से चलकर मोदी के विरुद्ध बनारस लड़ने का एलान कर चुके हैं. हार्दिक पटेल ने भी कुछ ऐसा ही मंशा ज़ाहिर किया है. फिर राष्ट्रीय स्तर के नेता कन्हैया कुमार मुसलमान समुदाय के हिस्से में जाने वाली सीट से ही चुनावी मैदान में उतरने के लिए क्यों उतावले है? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करके खुद की जीत सुनिश्चित कर सके? यानी कि मुसलमानों की गर्दन पर चाकू चलाकर कन्हैया को सुरक्षित किया जा रहा है.

(लेखक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्था (TISS), मुम्बई से पढ़े हैं. वर्तमान में बिहार के किसानों के साथ काम कर रहे हैं.)

आजादी का गुमनाम सिपाही ‘शेर अली अफ़रीदी’, जो आज ही देश के लिए झूला था फांसी पर

आज के रोज़ ही 11 मार्च 1872 को “शेर अली अफ़रीदी” को भारत के सबसे बड़े अंग्रेज़ अफ़सर “वाईसराय लार्ड मायो” के क़त्ल के जुर्म में फांसी पर लटका दिया गया था।

ये तस्वीर उसी अज़ीम मोजाहिद-ए-आज़ादी शेर अली आफरीदी की हैं जिन्होंने उस वक़्त भारत के वाइसराय लार्ड मायो को कत्ल किया था..। याद रहे की उस समय वाइसराय की हैसियत एक राष्ट्रपति जैसी होती थी वो पूरे मुल्क का एक तरह हुक्मरान होता था जो सिर्फ़ ब्रिटेन की महरानी के मातहत काम करता था…।

एक छोटा सा गांव जमरूद (आफ्गानिस्तान से सटे) का रहने वाला बहादुर इंसान जिसका नाम शेर अली ख़ान था जिन्हें 30 साल की उम्र में ही काले पानी की सज़ा हुई…।

जुर्म सिर्फ़ यह था कि देश की आज़ादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ़ बागवात की, और भारत के इतिहास के सुनहरे पन्नो में वह पहला व्यक्ति था जिसने किसी गवर्नर जनरल को मौत के घाट पहुचाया अर्थात उस वक़्त के Lord Mayo को इतना ज़ख्मी किया की कोलकात्ता आते आते उसकी मौत हो गयी…।

2 april 1767 को Colonel Pollock, Commissioner of Peshawar ने काला पानी का फ़ैसला सुनाया था…।

देश को अंग्रेजों से छुटकारा दिलाने और यहां से खदेड़ने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया, मकसद सिर्फ़ यह था अंग्रेजों भारत छोड़ो, कराची और मुंबई होते हुए उनको अंडमान की जेल (1869 ) में पहुँचा दिया गया था…।

वहाँ पर नाई बन कर जिंदगी गुजारने लगे और उस पल का इन्तेज़ार करने लगे कि कब यहाँ पर लॉर्ड मायो का आना है ताकि में उसका वध कर सकुँ और भारत का अंग्रेज़ों से छुटकारा मिल सके, उन्हें अच्छी तरह मालूम था अगर मैं नाई का काम करूँगा तो अंग्रेजों के करीब जाने का मौका मिल सकेगा और मेरे उपर अंग्रेज़ो का शक नही होगा, उस समय भारत के वाइसराय लार्ड मायो को कत्ल किया था याद रहे की उस समय वाइसराय की हैसियत एक राष्ट्रपति जैसी होती थी वो पुरे मुल्क का एक तरह हुक्मरान होता था जो सिर्फ़ ब्रिटेन की महरानी के मातहत काम करता था…।

1869 से इन्तेज़ार करते करते वह वक़्त भी आया जब Lord Mayo Feb 8 1872 को अंडमान निकोबार पहुँचा, Hope Town नाम के जजीरे के पास जाकर वह छुप गये और उसी के पास से Lord Mayo का गुजर हुवा और पल भर गवाए बिना उन्होेंने देश पर ज़ुल्म करने वाले गवर्नर जनरल को अपने चाकू का निशाना इस तरह बनाया कि समुद्र के पानी में गिर गया जिसको इलाज के लिये कोलकात्ता लाते लाते मृत्यु हो गयी…।

उनसे जब पूछा गया कि आपने ने लॉर्ड मायो को क्यों मारा? , देश का बहादुर यो जवाब दिया ” he had done it on orders from God. Then he was asked, if there was any co-conspirator. He said: ‘Yes, God is the co-conspirator.’”

और Mar 11 1872 को जब सूली को हँसते हँसते चूमा, भारतीय जेल कर्मी को मुखातिब करते हुए उनके ज़ुबान पर ये शब्द मौजूद थे “‘Brothers! I have killed your enemy and you are a witness that I am a Muslim.’ And then he breathed his last while reciting Kalima.”

सभी जानते है अंग्रेजों ने 1857 के प्रथम स्वटतन्त्रा के आज़ादी विफल होने पर खास तौर से मुस्लिम जनता को निशाना बनाया था और इसका ताज़ा सबूत अंडमान और निकोबार है जहा अभी हाल ही के वर्षो में सबसे ज़्यादा आबादी वाहा मुस्लिम की थी… क्योंकि जब देश के हर कोने से मुस्लिम उल्मा रेशमी रुमाल आंदोलन इत्यादि और लोगों को काला पानी दिया जाता तो अंडमान निकोबार भेज दिया जाता और वह लोग भी अपना तक़दीर समझ कर वही बस गये और शादी व्याह करके वही जिंदगी काटने लगे और इस इन्तेज़ार मे लगे रहे की हम लोगो की क़ुर्बानी बेकार नही जाएगी और इंशालहा एक दिन अपना देश आज़ाद होगा तो हम लोग फिर अपने घरो को लौटेगे…।

इस तरह काला पानी की सज़ा पाने वाले सबसे ज़्यादा अनुपात मुस्लिमों का ही था और सारा अंडमान और निकोबार मुस्लिमों से पॅट गया था…। आज़ादी के बाद सरकार ने लोगों को नौकरी इत्यादि का लालच देकर तमिलनाडु और अन्य राज्यों से लोगों को बुलाकर वहाँ बसाया, इस तरह अब फिलहाल मुस्लिम की अनुपात कम हो गयी है…।

ऐसे गुमनाम शहीदों को श्रधंजलि देने वाले आज बहुत कम हैं, मगर जिन्होनें देश के लिए अपनी जान की आहुति दे दी उनको अपना मक़सद प्यारा था ना की नाम और शोहरत…।

साभार: इंडियन मुस्लिम