Opinion

अपनी उम्मीदों से मुझे अपराधी मत बनाइये, मैं इतनी उदासी नहीं ढो सकता- रवीश कुमार

Ravish Kumar Sacha Reporter

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर रवीश कुमार ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी दिल की बात कह डाली है। रवीश ने फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा, कई बार उम्मीदें ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डाल देती हैं। हर आंधे घंटे पर कोई फोन पर होता है, उसकी कहानी अर्जेंट भी होती है और दर्दनाक भी, पर मैं तो अकेला ही होता हूं।

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उन्होने लिखा,”सबकी बात इसी से ख़त्म होती है कि आप ही से उम्मीद है। मैं किससे उम्मीद करूं। मैं किसकी तरफ़ देखूं। ना कहते कहते अपराध बोध से घिर जाता हूं। एक तो बोलने के लिए बुलाने वालों ने रूला दिया है और दूसरा अपनी व्यथा सुनाने वालों ने। न तो क्षमता है न संसाधन। हम बहुत सीमित संसाधन में काम करते हैं। किस किस की स्टोरी करूँ । फोन पर सुनते सुनते कान में दर्द हो गया है। व्हाट्स अप खोलो तो लोग पहले से घेरने के लिए मौजूद रहते हैं।”

रवीश आगे लिखते हैं, ”रोज़ दस से पंद्रह लोग अपनी कहानी लेकर मिलने चले आते हैं। पता नहीं यह किस वजह से हो रहा है। क्या बाकी चैनलों में पत्रकारों ने लोगों से मिलना बंद कर दिया है? क्या वहां लोगों की स्टोरी नहीं हो रही है? कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिनकी स्टोरी अखबारों में कवर हो चुकी होती है, मगर कोई असर नहीं होता। आज एक किसान चुरू से चले आए। बीस दिन से उनके साथी धरने पर हैं। मैं घड़ी देखता हुआ भागा जा रहा था। उसके पहले चार लोग दो सौ पन्ने का दस्तावेज़ लेकर घेरे हुए थे। एक- एक पेज लेकर समझाने लगे।”

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उन्होने लिखा, ”एम्स के डाक्टर जैसी हालत हो गई है। मुझे पता है कि आपको उम्मीद है, मुझे यह भी पता है कि मैं सबकी उम्मीद पूरी नहीं कर सकता। ना कह देता हूं, मगर ना कहने की प्रक्रिया इतनी सामान्य नहीं है। कहते हुए भी बुरा होता है, दूसरी तरफ की आवाज़ मायूस होने लगती है और फोन बंद करने के बाद नींद से लेकर हंसी तक ग़ायब हो जाती है। थोड़ा सोचिएगा। हो सके तो मुझे कुछ दिनों के लिए अकेला छोड़ दीजिए। अपनी लड़ाई ख़ुद लड़िए। मैं भी हारी हुई लड़ाई लड़ रहा हूं। आप भी लड़िए।”

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Ravish Kumar Sacha Reporter

”अपनी उम्मीदों से मुझे अपराधी मत बनाइये। मैं इतनी उदासी नहीं ढो सकता। इस वक्त जब यह लिख रहा हूँ महाराष्ट्र से आठ लोग पिछले दो घंटे से बाहर इंतज़ार कर रहे हैं। मुझे पता है आप इसे आशा और निराशा के फ्रेम में ही देखेंगे। उसकी बात नहीं है।”

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