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‘शहीद पीर अली खां’ – भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम 1857 के गुमनाम पीर

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Shaheed Peer ali Khan

Shaheed Peer ali Khan

इस हमले के बाद पटना में अंग्रेजों का जो दमन-चक्र चला, वह भयावह था। पुलिस द्वारा संदेह के आधार पर हजारों लोगों, खासकर मुसलमानो के घरों में घुसकर सैकड़ों निर्दोष लोगों की गिरफ्तारियां की गईं। कुछ लोगों को झूठा मुठभेड़ दिखाकर गोली मार दी गई। बहुत सारे लोगों के घर तोड़ डाले गए। अंततः 5 जुलाई, 1857 को पीर अली और उनके चौदह साथियों को बग़ावत के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पीर अली को असहनीय यातनाएं दी गईं। पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने उनसे कहा कि अगर वे देश भर के अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम बता दें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है। पीर अली ने उनका प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा–‘जिंदगी में कई ऐसे मौक़े आते हैं जब जान बचाना ज़रूरी होता है। कई ऐसे मौक़े भी आते हैं जब जान देना जरूरी हो जाता है। यह वक़्त जान देने का है।’ अंग्रेजी हुकूमत ने दिखावे के ट्रायल के बाद 7 जुलाई, 1857 को पीर अली को उनके साथियों के साथ बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया। फांसी के फंदे पर झूलने के पहले पीर अली के आखिरी शब्द थे – ‘तुम हमें फांसी पर लटका सकते हो, लेकिन हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मरूंगा तो मेरे खून से लाखों बहादुर पैदा होंगे जो एक दिन तुम्हारे ज़ुल्म का खात्मा कर देंगे।’
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