रवीश कुमार: ‘लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था से ध्यान हटाने के लिए चांद देखिए जनाब’

इस बीच आई पी एल मैच के उद्घाटन को 21 करोड़ 90 लाख लोगों ने देखा है। पिछली बार के उद्घाटन मैच की तुलना में 31 प्रतिशत दर्शक अधिक आए हैं, उसका कारण यह है कि हिन्दी जगत में टीवी का विस्तार 30 प्रतिशत हुआ है। राजनीति में जो लोग गोदी मीडिया के चैनलों के असर को कम समझते हैं उन्हें इस डेटा को देखना चाहिए। नए इलाके में टीवी के साथ न्यूज़ चैनल भी पहुंचे हैं। पहली बार दर्शक बन रहे लोगों के ब्रेन वॉश का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

बिजनेस स्टैंडर्ड की श्रीमि चौधरी ने लिखा है कि CBDT (central board of direct taxes) ने आयकर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को कड़ी चेतावनी भेजी है। लिखा है कि हालात बेहद गंभीर हैं। इस बार यानी 2018-19 के बजट में प्रत्यक्ष कर की वसूली का लक्ष्य 12 लाख करोड़ रखा गया था मगर अब जब इस वित्त वर्ष की समाप्ति में मात्र चार दिन रह गए हैं, वसूली अपने लक्ष्य से दो लाख करोड़ पीछे है। अभी तक 10.29 लाख करोड़ आयकर ही जमा हो सका है। इसके पहले वित्त वर्ष की तुलना में 12.5 प्रतिशत अधिक वसूली हुई है मगर बजट में तय किए गए लक्ष्य से अभी काफी पीछे है।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की ख़बर है कि भारत सरकार एलपीजी और केरोसीन की सब्सिडी का भुगतान नहीं कर पाएगी। अखबार के संवाददाता सौरभ कुमार ने लिखा है कि मार्च तक भारत सरकार को 32,000 करोड़ का भुगतान करना है। सरकार अपने वित्तीय घाटे के लक्ष्य को कम करने के लिए ऐसा कर रही है। उसे दोनों का मिलाकर 36,500 करोड़ का भुगतान करना है। पेट्रोलियम मंत्रालय को 48,000 रुपये चाहिए थे मगर अभी तक 16,500 करोड़ ही मिले हैं। ज़ाहिर है सरकार के पास पैसा नहीं है। पैसा क्यों नहीं है, कहां गया?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने जीएसटी के बारे में लिखा है कि जीएसटी को लेकर भी जो लक्ष्य तय किए गए हैं वो पूरे नहीं हो सके हैं। हर महीने एक लाख करोड़ का लक्ष्य रखा गया था। 2018-19 के बीच सिर्फ तीन बार ही एक लाख करोड़ की वसूली हो सकी है। जीएसटी से भी टैक्स चोरी नहीं रूकी है। आज के ही जागरण में खबर छपी है कि 70 कंपनियां फर्ज़ी बनाकर 238 करोड़ की टैक्स चोरी की गई है। 22 मई 2018 की खबर बिजनेस टुडे में छपी है। इसके अनुसार फर्ज़ी बिल बनाकर 450 करोड़ के इनपुट टैक्स वसूले गए हैं यानी चोरी हुई है। 14 नवंबर 2018 की ख़बर है कि कर्नाटक में 20 फर्ज़ी कंपनियां बनाकर जीएसटी फ्राड किया गया है। 1200 करोड़ की टैक्स चोरी हुई है। 27 जनवरी 2019 की खबर एनडीटीवी पर है। इसके अनुसार अहमदाबाद के 29 साल के एक नौजवान ने 66 फर्ज़ी कंपनियां बना ली थीं, इसके ज़रिए उसने 177 करोड़ टैक्स चोरी का जुगाड़ किया था। 18 जनवरी 2019 को वडोदरा से एक टैक्स कंस्लटेंट को गिरप्तार किया गया था जिसने बोगस बिल बनाकर 582 करोड़ की कर चोरी का प्रयास किया था।

सरकार ज़रूर कर चोरी को पकड़ रही है मगर जीएसटी को लेकर वादा किया गया था कि कर चोरी रुक जाएगी। टैक्स चोरी करना नामुमकिन हो जाएगा। फर्ज़ी कंपनी बनाने का सिलसिला जारी है। न मालूम कितनी कंपनियां बनाकर कर चोरी की जा चुकी होगी। क्या जीएसटी के बाद भी सब कुछ वैसा ही चल रहा है। ज़रूर 3000 करोड़ से अधिक की कर चोरी पकड़ी गई है मगर यह खबर परेशान करने वाली है कि टैक्स चोरी हो रह है।

इसका मतलब है कि टैक्स चोरी करने वाला सिस्टम बरकरार है। अधिकारी बताते हैं कि फर्ज़ी बिल वाला स्कैम बहुत ज़्यादा बढ़ चुका है। भारत भर में बड़े पैमाने पर पकड़ा जा रहा है। जो पकड़े जाते हैं उसके बाद भी दूसरे चैनल से वही लोग फर्ज़ी बिल बनाने का नया जुगाड़ ले आते हैं। यानी कि जीएसटी आने से करप्शन और चोरी रूकने का दावा कमज़ोर पड़ चुका है।

इंडियन एक्सप्रेस के हरीश दामोदरन ने लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले पांच साल में हर तरह से कमाई घटी है। फसलों की कीमत कम हुई है और मज़दूरी घटी है। हरीश दामोदरन ने अपने लेख का अंत एक सवाल से किया है। क्या इसके कारण किसान चुनावों में मोदी को वोट नहीं करेंगे? वे लिखते हैं कि यूपीए-2 के समय फसलों की कीमत भी बढ़ी थी और वास्तविक मज़दूरी भी लेकिन किसानों ने कांग्रेस को वोट नहीं किया था। तो इसका मतलब यह हुआ कि किसान संकट में है, कोई ज़रूरी नहीं है कि इसके कारण मोदी का भविष्य संकट में है।

जेट एयरवेज़ का सकंट सुलझा नहीं है। यहां 15000 कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। सैलरी बढ़ नहीं रही है। घट रही है। लोग निकाले जा रहे हैं। दोषी प्रबंधन ही है मगर 15000 कर्मचारियों का जीवन प्रभावित होने जा रहा है। एयरवेज़ भारत का सफलतम सेक्टर था मगर इस सेक्टर के कई ब्रांड कमज़ोर हुए हैं। जहाज़ ज़मीन पर खड़े हैं। कम जहाज़ उड़ने के कारण यात्री ज़्यादा किराया दे रहे हैं। पिछले दिनों भारत में यात्रियों की संख्या काफी बढ़ी है मगर इसके बाद भी यह सेक्टर संकट में क्यों आया। बिजनेस स्टैंडर्ड में धीरज नैय्यर ने लिखा है कि दुनिया भर में इस सेक्टर में संकट है। अमरीका में 100 विमान कंपनियां दीवालिया होने के कगार पर हैं। धीरज ने भारत में सरकार की नीतियों को बड़ा कारण बताया है। जिसके कारण इस सेक्टर की लागत बढ़ गई है।

भारत में हवाई जहाज़ के ईंधन पर टैक्स बहुत ज़्यादा है। लागत का एक तिहाई ईंधन पर ही ख़र्च होता है। जब दुनिया के बाज़ार में ईंधन महंगा हो तब सरकार को अपना टैक्स घटाना चाहिए था। एक तरफ सरकार एयरपोर्ट के विकास को लेकर दावे करती है दूसरी तरफ धीरज नैय्यर लिखते हैं कि भारतीय एविएशन सेक्टर के संकट का कारण यह है कि एयरपोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास तेज़ गति से नहीं हुआ है। कम लागत वाले विमानों के लिए दुनिया भर में अलग एयरपोर्ट होते हैं भारत में दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू में इनका विकास नहीं हो सका है। भारत में सभी एयरलाइन को ज़्यादा फीस देकर मुख्य एयरपोर्ट का ही इस्तमाल करना पड़ता है। धीरज नैय्यर वेदांता कंपनी के मुख्य अर्थशास्त्री हैं।

चुनावी भीड़ से निकल कर अर्थव्यवस्था को समझते रहिए। किसी सरकार को पंसद नापसंद करने के लिए नहीं बल्कि अपनी समझ के विस्तार के लिए। हिन्दी के अख़बारों ने तय कर लिया है कि वे हिन्दी के पाठकों की हत्या करके रहेंगे। उन्हें इतना मूर्ख बनाकर रखना है ताकि कोई नेता आए और प्रचार माध्यमों के सहारे उल्लू बना कर निकल जाए। हिन्दी अख़बारों को पढ़ते वक्त सतर्क रहने की ज़रूरत है। न्यूज़ चैनलों का हाल तो आप जानते ही हैं।